प्यार या खेल?

दुनिया की नज़रों में प्यार कोई खेल ही होगा

जो आज इज़हार किआ और कल नकार दिया

जाने इस दुनिया के झूठे सच्चे रिवाज़ों के दायरों ने 

कितने दिल मिट्टी किये और कितनों को सवाार दिया

जाति धर्म पैसा और कुंडली, ये सब प्यार को क्या जाने

इन सब को देख कर किआ तो क्या ही प्यार किआ

लेकिन हम सब को अक्सर चुप हो ही जाना पड़ा था

माँ बाप के लिए अपनी खुशियों को बेबस होकर मार दिया

बहुत से प्यार अधूरे रह गए होंगे, कितना तड़पे होंगे वो

उसने खुशियां छीन ली, जिसनेे ज़िन्दगी का उपहार दिया |

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17 Comments Add yours

  1. Sayar_AV says:

    👌👌👌👌

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  2. Madhusudan says:

    क्या खूब लिखा है एक दर्द —सच में—जाति धर्म पैसा और कुंडली, ये सब प्यार को क्या जाने!

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    1. सर काश ये दर्द आज कल के माँ बाप समझ पाएं या काश मेरी इस कविता को वे पढ़ें और अपने बच्चों की ज़िन्दगी में इनके दायरे ना बनाएं |😕

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      1. Madhusudan says:

        बिलकुल सही कहा।

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  3. fantasypal says:

    Amazing thoughts potrayed…in amazing way!👏👏

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  4. Bahut se pyar adhure reh gaye honge.. lajawab.

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  5. बहुत ही अच्छा लिखा है। ये मासी कविता पढ़ ली आपकी।

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    1. Shukriya maasi🙏😇

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      1. आज कल कहाँ हो? हमें भूला ही दिया है।

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      2. Maasi thoda niji zindagi mein vyast hun. Jaldi fir se likhna shuru krungi.😇

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