अल्फ़ाज़ों की कमी..

कुछ अल्फ़ाज़ों की कमी आज मेरी कलम में झलकती है

कुछ एहसासों की कोयल नीले अम्बर में चहकती है

मैं इक मोती के जैसे भटकती दुनिया के सागर में,

कुछ अश्कों की बूंदे बरसात की तरह टपकती हैं।

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कुछ लम्हों में मेरे किस्से यूँ ही सिमटते हैं

कुछ ख्वाबों के मंज़र भी तो यूँ ही तरसते हैं

मैँ इक पंछी के जैसे कैद इन झूठी नफरतों में

कुछ आकाश में बादल मानो यूँ ही गरजते हैं।

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कुछ शिकवे साज़िशों की आग में जैसे झुलसते हैं

कुछ रंग हमारे अपनों के भी तो वैसे बदलते हैं

मैँ कड़ी की तरह उलझी कच्चे पक्के धागों में

कुछ गर्ग के हज़ारों लफ्ज़ बर्फ के जैसे पिघलते हैं।

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17 Comments Add yours

  1. Abhay says:

    बहुत खूब!

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    1. शुक्रिया😇🙏

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  2. Bahut khub likha aapne….kuchh ashkon ki bund barsaat ki tarah barasti hai….

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    1. Ji bahut bahut shukriya🙏😇

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    1. Thanks a ton! 😇

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    1. Shukriya😇🙏

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      1. Swagat Hai Veronica ji.

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    1. Thanks a ton😇🙏

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  3. बहुत अच्छा लिखा है आपने…
    शानदार…👌

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    1. शुक्रिया😇🙏

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  4. Rekha Sahay says:

    लाजवाब, मुझे तो नहीं लगता कहीं — कुछ अल्फ़ाज़ों की कमी है।

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    1. बहुत बहुत आभार आपका 😇

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  5. Siddhant says:

    क्या बात है, लगता है अल्फ़ाज़ों की कमी ही कलम को ज़ोर देती है। बहुत ख़ूब।

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    1. शुक्रिया🙏😇

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