​ऐ ज़िन्दगी…

ऐ ज़िन्दगी जितने भी मौसम दिखाने हैं दिखा 

धूप दिखा छाँव दिखा, भरता हुआ वो घाव दिखा 

तू चाहे तो पत्थरों और काँटों पर चला ले मुझे

हंस कर चल लूंगी , पल पल चाहे फिर मर लूंगी

तू क्या सोचती है मैं डर गयी हूँ तुझसे, मगर नहीं

अब डर नहीं मुझे, क्योंकि मेरी फ़िकर नहीं तुझे

जो तुझे फ़िकर होती मेरी, तू थाम लेती वो अँधेरी

जिसने मेरा साया तक झंझोर कर रख दिया था

जिसने मुझे तोड़ दिया था, रुख भी मेरा मोड़ दिया था 

हाँ हाँ मैं उसी तूफ़ान की बात कर रही हूँ, वही तूफ़ान 

जिसने मुझे अँधेरा दिया, तब चांद ने भी ना पहरा किया

जो तूने अपनी मर्ज़ी से मेरे साये के हिस्से डाला था 

आज तू मेरे दर्द सुन कर जा, वो जाल पूरा बुन कर जा 

फिर जो चाहे कर ले, नहीं घबराती अब उन तूफानों से 

मैं अब तुझसे आगे निकल चुकी हूँ

बहुत आगे निकल चुकी हूँ…!

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13 Comments Add yours

  1. Bahut badhiya…….dar ke aage jeet hai ….khubsurat

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    1. Bahut acha laga ke apko pasand ayi. Shukriya 🙏

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      1. स्वागत आपका।

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  2. Rohit Nag says:

    Wow ….ifs like u narrated whole life in your beautiful poem👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
    Very well written 👌🏻

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    1. Thanks a ton👏

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  3. अच्छा लिखा है।

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    1. शुक्रिया🙏😇

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      1. बेटा मै ने अपने रियल लाइफ की कहानी का पांच भाग लिखा है। पढ़कर बताना कैसा लगा? मुझे तुम्हारे कमेंट का इंतजार रहेगा।

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      2. जी माँ-सी, मैं आज ही पढ़ती हूँ इसे |😊

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