अल्फ़ाज़ों की कमी…

अल्फ़ाज़ों की कमी आज मेरी कलम से झलकती है

कुछ एहसासों की कोयल नीले अम्बर में चहकती है

मैं एक मोती के जैसे भटकती दुनिया के सागर में

फिर अश्कों की बूंदे आँखों के अम्बर से टपकती हैं।

कुछ लम्हों में मेरे किस्से यूँ ही सिमटते हैं

कुछ ख्वाबों के मंज़र भी तो यूँ ही तरसते हैं

मैँ एक पंछी के जैसे कैद इन झूठी नफरतों में

दिल के आकाश में बादल तो मानो यूँ ही गरजते हैं।

शिकवे, साज़िशों की आग में जैसे झुलसते हैं

कुछ रंग हमारे अपनों के भी तो वैसे बदलते हैं

मैँ कड़ी की तरह उलझी कच्चे पक्के धागों में

कभी हज़ारों लफ्ज़ मेरे बर्फ के जैसे पिघलते हैं।

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